शुक्रवार, 12 जून 2026

बिना योग्य मेडिकल लेबोरेटरी प्रोफेशनल्स के संचालित लैबों पर हो कार्रवाई, मरीजों की सुरक्षा सर्वोपरि: जे एफ एम एल टी इंडिया

 बिना डिग्रीधारी अथवा डिप्लोमाधारी योग्य कार्मिकों के मेडिकल लेबोरेटरी का संचालन गलत; प्रदेशों के स्वास्थ्य विभाग करें सख्त कार्रवाई : JFMLT India

नई दिल्ली।

ज्वाइंट फोरम ऑफ मेडिकल लेबोरेटरी टेक्नोलॉजिस्ट इंडिया (JFMLT India) ने देश के सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के स्वास्थ्य विभागों से मांग की है कि बिना मान्यता प्राप्त डिग्री अथवा डिप्लोमा प्राप्त मेडिकल लेबोरेटरी प्रोफेशनल्स के संचालित हो रही मेडिकल डायग्नोस्टिक लेबोरेटरी एवं पैथोलॉजी प्रयोगशालाओं के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाए।

JFMLT India के अनुसार मेडिकल लेबोरेटरी साइंस स्वास्थ्य सेवाओं का एक महत्वपूर्ण आधार है, जहां जांच रिपोर्ट के आधार पर चिकित्सक रोग का निदान एवं उपचार निर्धारित करते हैं। ऐसे में यदि प्रयोगशालाओं का संचालन योग्य एवं प्रशिक्षित मेडिकल लेबोरेटरी प्रोफेशनल्स के बिना किया जाता है तो गलत जांच रिपोर्ट, गलत निदान तथा मरीजों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

संगठन ने कहा कि देश के अनेक राज्यों में आज भी ऐसी प्रयोगशालाएं संचालित हो रही हैं, जहां आवश्यक शैक्षणिक योग्यता एवं तकनीकी दक्षता रखने वाले मेडिकल लेबोरेटरी प्रोफेशनल्स उपलब्ध नहीं हैं। यह स्थिति मरीजों की सुरक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता के लिए गंभीर चुनौती है।

JFMLT India ने सभी राज्य सरकारों एवं स्वास्थ्य विभागों से मांग की है कि—

• राज्यभर में संचालित मेडिकल लेबोरेटरी एवं डायग्नोस्टिक सेंटरों का विशेष निरीक्षण अभियान चलाया जाए।
• योग्य डिग्रीधारी एवं डिप्लोमाधारी मेडिकल लेबोरेटरी प्रोफेशनल्स की उपलब्धता का सत्यापन किया जाए।
• नियमों का उल्लंघन करने वाली प्रयोगशालाओं के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
• राष्ट्रीय आयोग फॉर एलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोफेशन्स (NCAHP) के मानकों एवं दिशानिर्देशों का पालन कराया जाए।
• आम जनता को सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण एवं विश्वसनीय प्रयोगशाला सेवाएं उपलब्ध कराने हेतु प्रभावी निगरानी तंत्र विकसित किया जाए।

JFMLT India का मानना है कि देश में मेडिकल लेबोरेटरी सेवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने तथा मरीजों के हितों की रक्षा के लिए केवल योग्य एवं प्रशिक्षित मेडिकल लेबोरेटरी प्रोफेशनल्स द्वारा ही प्रयोगशालाओं का संचालन एवं तकनीकी कार्य किया जाना चाहिए।

मेडिकल लेबोरेटरी साइंस के क्षेत्र में योग्य शिक्षकों की भर्ती न होना एवं NCAHP दिशानिर्देशों का पालन न होना : एक गंभीर चुनौती

 

मेडिकल लेबोरेटरी साइंस के क्षेत्र में योग्य शिक्षकों की भर्ती न होना एवं NCAHP दिशानिर्देशों का पालन न होना : एक गंभीर चुनौती

मेडिकल लेबोरेटरी साइंस (Medical Laboratory Science) स्वास्थ्य सेवाओं का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। रोगों के निदान, उपचार की निगरानी एवं स्वास्थ्य प्रबंधन में मेडिकल लेबोरेटरी प्रोफेशनल्स की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। भारत में इस क्षेत्र को विनियमित करने के लिए National Commission for Allied and Healthcare Professions (NCAHP) द्वारा मानक एवं दिशानिर्देश निर्धारित किए गए हैं। इसके बावजूद अनेक मेडिकल कॉलेजों, विश्वविद्यालयों एवं प्रशिक्षण संस्थानों में योग्य शिक्षकों की नियुक्ति न होना तथा NCAHP के मानकों का पालन न करना एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है।

प्रमुख चुनौतियाँ

1. योग्य शिक्षकों की कमी

कई संस्थानों में मेडिकल लेबोरेटरी साइंस विषयों के लिए आवश्यक शैक्षणिक योग्यता एवं अनुभव रखने वाले शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की जाती। इसके स्थान पर अन्य विषयों के शिक्षकों से अध्यापन कार्य कराया जाता है, जिससे छात्रों को विषय की गहन एवं व्यावहारिक जानकारी प्राप्त नहीं हो पाती।

2. NCAHP दिशानिर्देशों की अनदेखी

NCAHP द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम, शिक्षक-छात्र अनुपात, प्रयोगशाला सुविधाओं तथा क्लिनिकल प्रशिक्षण मानकों का कई संस्थानों में पूर्ण पालन नहीं किया जा रहा है। इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है और छात्रों का व्यावसायिक विकास बाधित होता है।

3. कौशल आधारित शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव

मेडिकल लेबोरेटरी साइंस एक कौशल-आधारित (Skill-Based) प्रोफेशन है। योग्य फैकल्टी एवं आधुनिक प्रयोगशाला सुविधाओं के अभाव में विद्यार्थियों का व्यावहारिक प्रशिक्षण कमजोर रह जाता है, जिससे उनकी रोजगार क्षमता प्रभावित होती है।

4. रोगी सुरक्षा पर प्रभाव

अपर्याप्त प्रशिक्षण प्राप्त पेशेवरों द्वारा किए गए परीक्षणों में त्रुटियों की संभावना बढ़ जाती है। इससे रोगों के निदान एवं उपचार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जो अंततः रोगी सुरक्षा के लिए चुनौती बनता है।

संभावित समाधान

NCAHP मानकों का अनिवार्य अनुपालन

सभी विश्वविद्यालयों, मेडिकल कॉलेजों एवं प्रशिक्षण संस्थानों को NCAHP के मानकों और दिशानिर्देशों का अनिवार्य रूप से पालन करना चाहिए।

योग्य शिक्षकों की नियमित भर्ती

संस्थानों में मेडिकल लेबोरेटरी साइंस विषय में निर्धारित योग्यता एवं अनुभव रखने वाले शिक्षकों की पारदर्शी भर्ती सुनिश्चित की जानी चाहिए।

नियमित निरीक्षण एवं मूल्यांकन

संबंधित नियामक संस्थाओं द्वारा समय-समय पर निरीक्षण कर यह सुनिश्चित किया जाए कि संस्थान निर्धारित मानकों का पालन कर रहे हैं।

उद्योग एवं अस्पतालों से समन्वय

शैक्षणिक संस्थानों को अस्पतालों एवं डायग्नोस्टिक प्रयोगशालाओं के साथ सहयोग बढ़ाकर छात्रों को गुणवत्तापूर्ण क्लिनिकल प्रशिक्षण उपलब्ध कराना चाहिए।

फैकल्टी विकास कार्यक्रम

शिक्षकों के लिए निरंतर प्रशिक्षण, रिसर्च एवं कौशल उन्नयन कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए ताकि वे नवीनतम तकनीकों एवं मानकों से अपडेट रहें।

मेडिकल लेबोरेटरी साइंस शिक्षा की गुणवत्ता सीधे तौर पर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता से जुड़ी हुई है। योग्य शिक्षकों की भर्ती न होना तथा NCAHP दिशानिर्देशों की अनदेखी न केवल विद्यार्थियों के भविष्य बल्कि रोगी सुरक्षा और देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती है। इसलिए आवश्यक है कि सभी विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज एवं प्रशिक्षण संस्थान NCAHP मानकों का पूर्ण पालन सुनिश्चित करें और योग्य फैकल्टी की नियुक्ति को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।

शनिवार, 6 जून 2026

सीआरपी टेस्ट से दीपिका कक्कड़ के ट्यूमर का पता कैसे चला?पढ़ना, समझना जरूरी है,बिजनेस ना बनाये

कैंसर विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के आकस्मिक निष्कर्ष कभी-कभी गंभीर बीमारियों का शीघ्र पता लगाने में सहायक हो सकते हैं।

टीवी अभिनेत्री दीपिका कक्कड़ ने एक इंटरव्यू में बताया कि पित्ताशय के दर्द के लिए किए गए एक सामान्य मेडिकल चेकअप से एक बड़े ट्यूमर का पता चला। भारती सिंह और हर्ष लिम्बाचिया से बात करते हुए उन्होंने पित्त की पथरी से संबंधित दर्द होने के बाद सीआरपी टेस्ट करवाने की बात याद की।

हालांकि सूजन का स्तर मामूली रूप से बढ़ा हुआ था, लेकिन आगे की जांच से लगभग 8.5-9 सेंटीमीटर के ट्यूमर का पता चला।

मुझे पित्ताशय में दर्द हुआ था...डॉक्टर ने मुझे सीआरपी टेस्ट दिया...यह आपके शरीर में संक्रमण दर का पता लगाता है, वो मैंने कराया, वो थोड़ा ज्यादा आया,ऐसा नहीं है कि बहुत हाई आया, जितना मेरा ट्यूमर एग्रेसिव था, उतना हाई नहीं आया वो...उसमें पता चला कि गॉल ब्लैडर में तो स्टोन है ही, पर यहां ट्यूमर है..और वो भी पहला स्कैन में था 8.5-9 सेमी का ट्यूमर...इसलीए जब अनहोन निकला,तोह अनहोनी साइड से एक्स्ट्रा स्पेस रख के 11 सेमी का पूरा एक टुकड़ा निकला,” उसने पॉडकास्ट पर खुलासा किया।

अंततः ट्यूमर को आसपास के ऊतकों के एक हिस्से के साथ हटा दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 11 सेंटीमीटर का एक हिस्सा शल्य चिकित्सा द्वारा हटा दिया गया।

उनके अनुभव से यह बात उजागर होती है कि गंभीर बीमारियों का पता कभी-कभी तब चलता है जब डॉक्टर देखने में असंबंधित लगने वाले लक्षणों की जांच करते हैं।

पीएसआरआई अस्पताल के वरिष्ठ सलाहकार हेमेटोलॉजिस्ट और ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. अमित उपाध्याय के अनुसार, इस तरह के निष्कर्ष असामान्य नहीं हैं।असंबंधित शिकायतों की जांच के दौरान संयोगवश ट्यूमर सहित गंभीर स्थितियों का पता चलना असामान्य नहीं है।

डॉ. उपाध्याय बताते हैं, "पेट के कई ट्यूमर, विशेष रूप से यकृत, अग्न्याशय, गुर्दे, पित्ताशय या आसपास के ऊतकों में उत्पन्न होने वाले ट्यूमर, अपने प्रारंभिक चरणों में लक्षणहीन रह सकते हैं।"

डॉ. उपाध्याय आगे कहते हैं, "मरीजों को अक्सर पेट में बेचैनी, सूजन, अपच, थकान या दर्द जैसे अस्पष्ट लक्षण महसूस होते हैं जो तुरंत कैंसर का संकेत नहीं देते। इन लक्षणों को अक्सर 'इंसिडेंटलोमा' कहा जाता है।" "कुछ मामलों में

अपने साक्षात्कार में दीपिका कक्कड़ ने बताया कि आक्रामक ट्यूमर होने के बावजूद उनके सीआरपी स्तर में मामूली वृद्धि हुई थी। इससे कैंसर का पता लगाने में सीआरपी की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं।

डॉ. उपाध्याय बताते हैं, “सीआरपी, या सी-रिएक्टिव प्रोटीन, शरीर में सूजन की प्रतिक्रिया में यकृत द्वारा उत्पादित एक प्रोटीन है। इसका उपयोग आमतौर पर संक्रमण, सूजन संबंधी बीमारियों और ऊतक क्षति के सूचक के रूप में किया जाता है।”

हालांकि कुछ कैंसर रोगियों में सीआरपी का स्तर बढ़ सकता है, डॉ. उपाध्याय इस बात पर जोर देते हैं कि यह कैंसर-विशिष्ट परीक्षण नहीं है।

वे कहते हैं, "सीआरपी का उपयोग अकेले कैंसर का निदान करने या उसे खारिज करने के लिए नहीं किया जा सकता है। कुछ कैंसर महत्वपूर्ण सूजन पैदा करते हैं और सीआरपी के स्तर में उल्लेखनीय वृद्धि का कारण बनते हैं, जबकि अन्य में केवल मामूली वृद्धि हो सकती है, या उन्नत बीमारी के बावजूद सीआरपी का स्तर सामान्य भी हो सकता है।"

यह परिवर्तनशीलता इस परीक्षण की सबसे बड़ी सीमाओं में से एक है। डॉ. उपाध्याय कहते हैं, "सीआरपी सूजन का सूचक है, न कि स्वयं कैंसर का। कई गैर-कैंसर संबंधी स्थितियां, जैसे संक्रमण, ऑटोइम्यून रोग, मोटापा, हाल ही में हुई सर्जरी और यहां तक ​​कि मामूली बीमारियां भी सीआरपी के स्तर को बढ़ा सकती हैं।"

यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और/या हमारे द्वारा चर्चा किए गए विशेषज्ञों पर आधारित है। कोई भी नियमित प्रक्रिया शुरू करने से पहले हमेशा अपने स्वास्थ्य चिकित्सक से परामर्श लें।





बिना योग्य मेडिकल लेबोरेटरी प्रोफेशनल्स के संचालित लैबों पर हो कार्रवाई, मरीजों की सुरक्षा सर्वोपरि: जे एफ एम एल टी इंडिया

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